ourhindistory.in

 

दानवीर कर्ण की जीवन परिचय एवं महागाथा (Danveer Karna’s biography and legend 2022)

आज हम आपको एक ऐसा योद्धा के बारे में बताने जा रहे हैं किसके साथ बचपन से ही अन्याय और छल कपट हुआ है. राजकुमार होने के बावजूद भी उन्हें बचपन से एक सुद् घर में पालन पोषण हुआ और समाज कर्ण को सूर्यपुत्र कहकर अपमान करते थे लेकिन फिर भी उसने अपने धर्म को कभी भी नहीं छोड़ा और वह जीवन के अंतिम छण तक अपने धर्म को निभाता रहा जी हां उस दानवीर योद्धा का नाम कर्ण है इस लेख में हम आपको कर्ण के जीवन परिचय एवं उनके साथ क्या-क्या छल कपट हुए कर्ण कितना शक्तिशाली और महान योद्धा थे कर्ण की पत्नी कौन थी और उसके बच्चे कितने और कौन थे और वे दानवीर कर्ण के नाम से क्यों प्रसिद्ध है आपको लेख के द्वारा कर्ण के बारे में संपूर्ण जानकारी देंगे

कर्ण की जीवन परिचय

कर्ण माता कुंती के पुत्र एवं पांच पांडव के सबसे बड़े भाई थे माता कुंती को सूर्य भगवान के आशीर्वाद स्वरुप करण की प्राप्ति हुई इसलिए कर्ण को सूर्यपुत्र भी कहा जाता है सूर्य के आशीर्वाद से जन्म लेने करण कर्ण सूर्य भगवान की तरह ही शक्तिशाली एवं पराक्रमी थे कर्ण भगवान परशुराम शिष्य ने के कारण इतने शक्तिशाली थे उन्हें कोई देवता भी पराजित नहीं कर सकता था कर्ण के जन्म से ही सूर्य भगवान के आशीर्वाद से उसके शरीर के ऊपर एक दिव्य सुरक्षा कवच एवं कुंडल था यह कवच और कुंडल इतना शक्तिशाली था कि इस कवच का भेदन बड़े से बड़े योद्धा तक भी नहीं कर सकते थे जिससे कि कर्ण को कोई नहीं हरा सकता था
 कर्ण का जन्म एवं पालन पोषण
कर्ण के जन्म माता कुंती के गर्व से हुआ था जिसे स्वयं भगवान सूर्य अपने आशीर्वाद के रूप माता कुंती के गर्व में दिए थे लेकिन माता कुंती अविवाहित होने के कारण और समाज उन्हें चरित्रहीन ना कहें इसलिए उन्होंने कर्ण को त्याग कर दिया माता कुंती ने कर्ण को जन्म लेते ही उसे एक टोकरी में रखकर नदी में दहा दिया

दानवीर कर्ण का परिवार

दानवीर कर्ण की पत्नी अपने के बारे में कहीं पर भी उल्लेख नहीं किया गया है लेकिन आधुनिक अतिथियों से से पता चलता है कि उनकी चार पत्नियां थी कर्ण पहली पत्नी  का नाम वैशाली था जो कर्ण की बचपन से ही मित्र थी और दूसरा पत्नी का नाम सुप्रिया था क्योंकि कोई राजकुमारी नहीं थी हुआ है एक दासी थी कर्म की तीसरी पत्नी का नाम उर्वी थी और चौथी पत्नी का नाम पद्मावती था
कर्ण के कुल 9 पुत्र था जिसका नाम वृक्षासन, चित्रसेन, सत्यसेन, सुसेन, पसेन,‌ चितरंजन जया,दवीपता,बनसेन, वृषकेतु‌ था सभी शक्तिशाली योद्धा थे

 कर्ण दानवीर कर्ण के नाम से क्यों प्रसिद्ध हुआ और कर्ण के द्वारा क्या- क्या दान दिया गए

कर्ण को महाभारत के समय से ही सबसे बड़ा दानवीर  कहां गया है इतने बड़े दानवीर थे कि दान देने से पहले वह एक बार भी नहीं सोचते और वचन दे देते थे कि सामने वाला व्यक्ति उनसे क्या मांगेगा वैसे ही इनके कुछ ऐसे दानों के बारे में हम आपको बताएंगे जिससे कर्ण दानवीर के नाम से प्रसिद्ध हो गए और उनको महान के साथ-साथ उनका मृत्यु का कारण भी बना
महाभारत के युद्ध के समय कर्ण सूर्यदेव का पूजा कर रहे थे तभी इंद्रदेव एक ब्राह्मण के रूप में आकर कर्ण से दान मांगते हैं  कर्ण कहता है क्या दान चाहिए वह ब्राह्मण कहता है तुम मुझे वचन दो कि जो हम मांगे   वह तुम दोगे कर्ण बिना कुछ सोचे यह जानते हुए भी कि वह ब्राह्मण नहीं इंद्रदेव हैं और वे कवच एवं कुंडल मांगने आए हैं फिर भी उन्हें बच्चन दे देते हैं इंद्रदेव ने कर्म से पशु कवच एवं कुंडल मांग लेते हैं कर्ण अपने कवच कुंडल को दान कर देते हैं कर्ण के कवच कुंडल शरीर में जुड़े होने के कारण निकालते समय लहूलुहान हो गए थे तभी से वे दानवीर कर्ण के नाम से प्रसिद्ध हुए और यही दान उनकी मृत्यु का कारण बना
एक बार अर्जुन को अपने उपर महान होने पर घमंड करने लगा और कृष्ण भगवान से कहने लगा कि मेरे जितना महान तो और कोई नहीं कभी कृष्ण भगवान मैं अर्जुन का घमंड तोड़ने के लिए उससे परीक्षा लिया कृष्ण भगवान ने अर्जुन के सामने अपना इच्छा प्रकट किया और कहा उनको चंदन के सुखी लकड़ियों से बनी हुई भोजन करने का मन कर रहा है कभी अर्जुन ने कहा बस इतनी सी बात मैं अभी जाकर आपके लिए जंगल से चंदन की लकड़ी लाकर आपके लिए भोजन बनाता हूं अर्जुन जंगल की ओर गया और चंदन के सुखी लकड़ी की खोज करने लगा लेकिन बारिश होने के कारण उसे कोई भी सूखी लकड़ी नहीं मिली वह हार मानकर कृष्ण भगवान को अपनी परेशानी बताई
कृष्णा भगवान अर्जुन को लेकर युधिष्ठिर के पास गए उनसे भी अपनी इच्छा प्रकट की लेकिन वह भी अर्जुन की तरह हार मानकर जंगल से लौट आया कृष्ण भगवान अर्जुन एवं युधिष्ठिर के साथ कर्ण के पास पहुंचे
कृष्ण भगवान कर्ण के समक्ष अपनी इच्छा प्रकट की तभी कर्ण अपने तीर धनुष को उठाया और अपने महल में लगा चंदन के दरवाजे को एक पल में तोड़ दिया और उससे भोजन बनाकर कृष्ण भगवान को अर्पित कर दिया
भगवान श्री कृष्णा अर्जुन और युधिष्ठिर को बोला यह कार्य तो तुम दोनों भी कर सकते थे लेकिन तुम दोनों ने जंगल में जाकर सुखी लकड़ी की तलाश में गए तभी वे दनों समझ गए कि कर्ण कितना बड़ा दानवीर है

अर्जुन और कर्ण में कौन महान है

एक बार भगवान श्री कृष्ण‌ अर्जुन बात हो रही थी महान कौन है अर्जुन या कर्ण. भगवान श्री कृष्णा ने दोनों की परीक्षा लेने सोची कृष्ण भगवान ने एक विशाल पर्वत को सोने में परिवर्तित कर दिया और अर्जुन से कहा जाओ और यह सारा सोना गरीबों में बट आओ अर्जुन सोने के पर्वतों को अपने हाथों से दान करते रहते हैं और वे थक जाते हैं वह सोने से बनी पर्वत को अपने हाथों से दान करते – करते थक जाते लेकिन वह पूरा सोने की पार्वत दान नहीं हो पाता है अर्जुन कृष्ण भगवान से करता है कि मैं थक चुका हूं और यह कार्य उनसे नहीं हो रहा है
कृष्ण भगवान मुस्कुराकर कहते हैं अर्जुन से जाओ कर्ण  को बुला लोओ और कृष्ण भगवान कर्ण से कहते हैं कि जाओ या सोने की पर्वत को सभी में बराबर बराबर दान कर दो. कर्ण सभी को नगर वासियों को इकट्ठा कर लेता है सभी को यह आदेश देता है कि जाओ और सोने से बनी पर्वत को सभी लोग आपस में बराबर बराबर बाट लो और कर्ण कृष्ण भगवान के दिए हुए कार्य को मात्र कुछ ही क्षणों में समाप्त कर देते हैं
और कृष्ण भगवान अर्जुन से कहते हैं देखो तुमने अपने महन बनने के लिए अपने हाथों से सभी को दान दिए ताकि लोग तुम्हें महान समझे तुम दान नहीं कर रहे थे बल्कि अपनी महानता साबित कर रहे थे लेकिन कर्ण ने केवल दान करने के बारे में सोचा उसे महान बनने के बारे में बिल्कुल नहीं सोचा यही उसकी महानता है