ourhindistory.in

 

यादव वंश का विनाश क्यों और कैसे हुआ

यादव वंश का विनाश क्यों और कैसे हुआ

यह कहानी शुरू होती है महाभारत के युद्ध से जब पांडव और कौरवों में युद्ध हुआ तो कृष्ण भगवान पांडव के तरफ थे और इस महायुद्ध में कौरवों का अंत और पांडवों का जीत हुई. कौरवों का वंश विनाश होने के कारण दुर्योधन की माता गंधारी को अत्यंत क्रोध आया और इस युद्ध और कौरवों का विनाश के कारण भगवान श्री कृष्ण को इस युद्ध का जिम्मेदार मानते हुए उनको श्राप दे दी कि जिस तरह आपस में युद्ध कर कौरवों वंश का विनाश हुआ है उसी तरह उनका यादव वंश का भी विनाश होगा. गंधारी के शराब के पश्चात कृष्ण भगवान अपने द्वारका नगरी लौट आए और  उन्होंने 30 वर्ष तक राज्य साहारा लेकिन गांधारी के श्राप के कारण द्वारका नगरी में कुछ ना कुछ आशुभ होते रहता था।

भगवान कृष्ण का बेटा शाम

भगवान कृष्ण की तीसरी पत्नी जामवंती थी जो कि जामवंत जी के बेटे थी. कृष्णा और जामवंती के पुत्र का नाम शाम था जो कि स्वभाव से बहुत ही बदमाश था जिस तरह कृष्ण भगवान अच्छे कामों के लिए जाने जाते थे इसके विपरीत उनके बेटे शाम को जाना जाता था शाम अत्यंत क्रोधित, अहंकारी, शराबी, बदमाश आदि था वह हमेशा अपने दोस्तों के साथ शराब के नशे में धुत रहता था वह कभी भी बड़ों का सम्मान नहीं करता था और भगवान श्री कृष्ण उसे समझाते तो वह समझने को तैयार नहीं था कृष्ण भगवान उसके इस हरकत से हमेशा परेशान रहते थे.

ऋषि दुर्वासा 

ऋषि दुर्वासा जोकि एक महान ऋषि थे जो महादेव का ही एक अशंरूप थे इसी कारण वह महामुनी और तेजस्वी होने के साथ-साथ उनको क्रोध बहुत जल्दी आ जाता था एक दिन ऋषि दुर्वासा भगवान श्री कृष्ण से मिलने द्वारका पहुंचे. तभी शाम शराब पीकर अपने दोस्तों के साथ नशे में धुत था उसे नशे में किसी को परेशान करने को सोच रहा था तभी उसे ऋषि दुर्वासा दिखे और शाम और उसके दोस्तों ने ऋषि दुर्वासा को परेशान करने की युक्ति सूची. शाम नशे के धुत में एक गर्भवती स्त्री के तरह साड़ी पहनकर अपने दोस्तों के साथ ऋषि दुर्वासा के पास गया और बोला की वह गर्भवती है वह अपना बच्चे के बारे में कुछ जानना चाहती है कि उसका बच्चा स्वस्थ एवं सुंदर तो होगा. लेकिन ऋषि दुर्वासा अत्यंत ज्ञानी एवं तेजस्वी होने के कारण उन्होंने अपनी आंख बंद कर मात्र कुछ श्रण में ही संपूर्ण बात का ज्ञात लगा लिया कि वे लोग ढोंगकर उन्हें मूर्ख बना रहे हैं ऋषि दुर्वासा ने समझाया कि तुम ढोंगकर कर रहे हो और मेरे समक्ष से चले जाओ लेकिन शाम और उसके दोस्तों ने उनका एक भी बात नहीं मानी और उन पर हंसने तथा उनका अपमान करने लगा इतना में ऋषि दुर्वासा का अत्यंत क्रोध आया और उन्होंने शाम को श्राप दे दिया कि जिस तरह से वह गर्भवती स्त्री का ढोंग कर रहा है एक सप्ताह के पश्चात उसी तरह उसके गर्भ से एक लोहे का जन्म होगा और उसके यादव वंश का विध्वंस का कारण बनेगा. ऋषि दुर्वासा कृष्ण भगवान से पुरी घटना और श्राप के बारे में बता देते हैं और कृष्ण भगवान कहते हैं कि जैसा आपने श्राप दिया बिल्कुल वही होगा ज्यादव वंश का विनाश अवश्य होगा ।

ऋषि दुर्वासा को द्वारिका  से चले जाने के बाद एक हफ्ता पश्चात शाम के घर से एक लोहे का जन्म होता है जिसके कारण कृष्ण भगवान और बलराम चिंतित हो जाते हैं कि यादवों का विनाश अब निकट आ गया‌ अभी बलराम ने उस लोहे के टुकड़े को सैनिको से बोलकर और से चूर-चूर कर पाउडर बनाकर द्वारिका से कहीं दूर फेंकने को कह देते हैं जिससे की श्राप को टाला जाए और शाम शराब पीकर उल्टा-पुल्टा हरकत करता था इसलिए बलराम ने पुरी द्वारका नगरी में बनने वाले शराब के कारखानों को बंद करवा दिया और  दूसरी नगरी से आने वाले शराब को भी बंद करवा दिया सभी शराब के अड्डे को सैनिकों के द्वारा बंद करवा दिया बलराम पूरी तैयारी कर रखे थे कि ऋषि दुर्वासा के श्राप को द्वारका नगरी पर हावी नहीं होने देंगे. लेकिन कृष्ण भगवान जानते थे कि यह श्राप ऋषि दुर्वासा के दिया हुआ है यह श्राप खाली नहीं जा सकता जो उन्होंने सब दिया वह होकर ही रहेगा यादव वंश का विनाश निश्चित है इसे कोई नहीं रोक सकता है.

और वह समय आई जाता है जब यादवों वंश का विनाश होगा कुछ माह बीतने के बाद सब लोग को लगने लगा कि ऋषि दुर्वासा का श्राप खत्म हो गया और सब कुछ ठीक हो जाएगा सब चिंता मुक्त हो गया लेकिन एक दिन जब शाम का जन्मदिन आता है तो वह अपने दोस्तों के साथ मिलकर कुछ समारोह तथा मदिरापान करना चाहते थे लेकिन बलराम जी पहले ही शराब के अड्डों को बंद करवा चुके थे इसलिए उन्हें शराब मिलना असंभव था लेकिन शाम के एक दोस्त ने कहा वाह शराब का इंतजाम कर सकता है कहीं तो अब द्वारका नगरी से दूर जाकर उसने शराब के इंतजाम कर लिया और द्वारिका नगरी एक झील के पास बैठकर शाम और उसके दोस्त मजे से मद्यपान कर रहे थे तभी शाम की पत्नी शाम को समझाने उसके पास पहुंच जाती है शाम अपनी पत्नी को वहां देख अत्यंत क्रोधित हो जाता है और कहता है यहां तुम क्या कर रही हो यहां औरतों का आने की जगह नहीं है तुम्हारी हिम्मत कैसे हुई यहां आने की. शाम की पत्नी कहती है आप मदिरापान मत कीजिए ऋषि दुर्वासा खेसरा को मत भुलिए वह श्राफ कभी भी सच हो सकता है ‌ यह बात सुनते ही शाम भड़क उठता है और कहता है कि ऋषि का श्राप खत्म हो गया और तुम यहां चली जाओ वरना तुम्हारे साथ अच्छा नहीं होगा.  यह बात सुनकर शाम की पत्नी रोते हुए जाती रहती है तभी रास्ते में उनको बलराम मिलते हैं बलराम उन को रोते हुए देख प्रश्न करते हैं कि तुम क्यों रो रही हो शाम की पत्नी शाम के बारे में सब बातें बता देती है यह बात सुनकर बलराम जय को अत्यंत क्रोध आ जाता है

 यादव वंश विनाश की शुरुआत

बलराम जी क्रोध लेकर शाम के पास पहुंचते हैं आज शराब से भरे हुए घर आ को तहस-नहस कर देते हैं और शाम पर अपना क्रोध भी निकाल देते हैं और उसे समझाते हैं कि तुम यह गलत कर रहे हो लेकिन शाम बलराम जी से बदतमीजी करता है और उन पर अपना क्रोध निकाल कर बरामदे पर हाथ उठाने लगता है उतना में ही कृष्ण भगवान भी उस जगह उपस्थित हो जाते हैं सभी बातें को सुनकर और परिस्थिति को देख क्रोध में आ जाते हैं और नदी के पास लगी हुई कुछ झाड़ी थी इसे कृष्ण भगवान उस झाड़ी को उखाड़ लेते हैं और झाड़ी एक लाठी में परिवर्तित हो जाता है दरअसल वह झाड़ी वही लोह चूर्ण से जन्मा हुआ पौधा था ऋषि दुर्वासा के श्राप के कारण शाम के गर्भ से लोहा जन्म लिया और बलराम जी ने उस लोहे को चूर्ण बनाकर सैनिकों के द्वारा कहीं दूर फेंकवा दिया था और बलराम जी भी उस झाड़ी को उखाड़ लेते हैं और फिर से वह झाड़ी लाठी में परिवर्तित हो जाता है उसके बाद धीरे-धीरे शाम और उसके दोस्तों ने भी जानिया को उठाकर लाठी में परिवर्तित कर लेते हैं और युद्ध आरंभ कर देते हैं इस युद्ध में धीरे – धीरे गांव वाला भी सम्मिलित हो जाता है कुछ गांव के लोग शाम की ओर से युद्ध करते हैं और कुछ गांव वाले कृष्ण भगवान की ओर से यह करते न्यूज़ बहुत समय तक चलते रहता है और इस युद्ध का परिणाम यह होता है कि केवल तीन लोग हैं इस युद्ध में जीवित बचते हैं कृष्ण भगवान बलराम और एक व्यक्ति. भगवान श्रीकृष्ण व्यक्ति को अर्जुन को बुलाने को कहते हैं

इस कहानी का उद्देश्य

सबको मृत्यु के अवस्था में देख बलराम जी के मन विचलित हो उठता है बलराम जी श्री कृष्ण से कहते हैं यह सब क्या हो गया हम लोगों ने स्वयं ही श्राप के कारण अपना वंश का विनाश कर दिए तो श्री कृष्ण उत्तर देते हैं कि नहीं बलदाऊ यह सब श्राप के कारण नहीं बल्कि अहंकार के करण हुआ है जब-जब इंसान में अहंकार आएगा वह इसी तरह स्वयं ही विनाश हो जाएगा यह मनुष्य के लिए एक सिख होगी जो मनुष्य इसे कभी नहीं दोहराएंगे इसके बाद बलराम की कहते हैं की मैं कुछ समझा नहीं कृष्ण भगवान कहते हैं अब हमारे जाने का समय आ गया है इतना सुनते ही बलराम जी भगवान श्री कृष्ण के चरणों में शेषनाग के रूप में अपना देह त्याग कर देते हैं