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समुंद्र मंथन होने के पीछे जो कहानी है उसे हम आपको थोड़ी विस्तार से बताएंगे आखिर क्या कारण पड़ गई देवताओं तथा असुरों के बीच समुंद्र मंथन की यह कहानी बहुत ही रोचक है इसे पढ़कर आप सबको बहुत ही आनंद आने वाला है

देवताओं के पास सब कुछ होने के बावजूद भी उन्होंने समुद्र मंथन क्यों किया और इसके पीछे क्या कहानी है

यह कहानी शुरू होती है ऋषि दुर्वासा से एक दिन ऋषि दुर्वासा वन में जा रहे थे तभी उन्हें एक पुष्पा की कुछ अच्छी खुशबू आती है और वो खुशबू इतनी तीव्र होती है कि ऋषि दुर्वासा को रहा नहीं जाता है और वह व संबंधित के पीछा करने लगते हैं पीछे करते-करते वह एक स्त्री के पास पहुंच जाते हैं जो अपने गले में एक पुष्प की माला पहने रहती है और वह सौगंधित खुशबू किसी और की नहीं बल्कि वही फूल माला की होती है ऋषि दुर्वासा उस स्त्री से पूछते हैं तुम कौन हो और यह पुष्प की बनी हुई माला का सौगंध आज तक मैंने पृथ्वी पर कहीं नहीं देखा तुमने इसे कहां से लाई हो वह स्त्री कहती है कि वह वायु की देवी है और यह माला उन्हें वायु देव ने स्वर्ग से लाकर दिया है ऋषि दुर्वासा को उस माला के प्रति आकर्षित देखकर वह स्त्री उस माला को ऋषि दुर्वासा को दे देती है

एक दिन ऋषि दुर्वासा अपने पितरों से मिलने स्वर्ग लोग जाते हैं और वहां उन्हें इंद्रदेव से भेंट होती है इंद्रदेव होने सम्मान देते हुए अपने राज्य में बुलाते हैं ऋषि वहां पहुंचकर इंद्रदेव को वही फूल की माला उन्हें भेंट करते वे कहते हैं कि यह दिव्य और सुगंधित माला पृथ्वी पर रहने के योग्य नहीं हैं यह वही माला होती है जो उन्हें वायु देवी ने दिया था उस पुष्प के माला को देखकर इंद्रदेव ऋषि दुर्वासा से कहते हैं कि आप तो पृथ्वी पर रहते हैं तो आपके लिए यह दिव्य माला अनोखी होगी लेकिन मेरे लिए यह माला तुझ्य है स्वर्ग लोक में यह ऐसा बहुत फूल भरा पड़ा है मैं इस पुरानी माला को क्या करूंगा अगर मुझे लगेगा तो मैं नया बनवा लूंगा ‌ लेकिन इंद्रदेव ऋषि दुर्वासा के भेद का अपमान नहीं करना चाहते थे इसलिए वह उस दीपमाला को एरावत हाथी को पहना दिए लेकिन उस फूल माल किंग सुगन्ध तीव्र थी कि ऐरावत हाथी को पसंद नहीं आया और उस माला को उसने अपने पैरों से तहस-नहस कर दिया
ऋषि दुर्वासा अपने भेंट को इस तरह अपमान देखकर बहुत ही क्रोध आया ऋषि दुर्वासा महादेव के अंश होने के कारण वे बहुत ही क्रोधित ऋषि थे और श्राप उनके जीवभा पर होती है और वह क्रोधित ऋषि के नाम से जाने भी जाते। इसलिए ऋषि दुर्वासा इंद्रदेव तथा सभी देवों को यह शराब दे दिया कि इस तरह से तुमने मेरे भेंट को तुझ्य और मुल्यहीन कहा है उसी तरह तुम देवताओं की शक्तियां तथा धन-संपत्ति सभी लुप्त हो जाएंगे ऋषि दुर्वासा के श्राप के कारण देवताओं ने अपनी शक्तियां खो दी विष्णु भगवान ने लक्ष्मी जी को खो दिया क्योंकि लक्ष्मी जी धन की देवी होने के कारण पूरे देवताओं को धन- दौलत प्रदान करती थी लक्ष्मी लुप्त होने से सभी देवताओं के पास से सोने-चांदी तथा हीरो अभूषण, सिंहासन, एरावत हाथी आदि सभी लुप्त हो गया यह बात असुरों के गुरु शुक्राचार्य को पता चला कि देवताओं ने अपनी शक्तियों खो दी है तो उन्होंने राजा बलि से स्वर्ग लोक पर आक्रमण करने को कहा ताकि वह शक्तिहीन देवताओं का लाभ उठा सके और स्वर्ग पर राज्य कर सके

इंद्रदेव पहुंचे ब्रह्मा जी के पास

इंद्रदेव परेशान होकर भगवान जी के पास पहुंचे और उनसे इस समस्या का समाधान पूछा तो उन्होंने कहा इस समस्या का समाधान केवल विष्णु भगवान ही बता सकते हैं सभी देवता मिलकर विष्णु भगवान के समक्ष प्रकट हुए और उनसे समाधान मांगी विष्णु भगवान ने कहा की अगर देवताओं को सभी शक्तियां धन दौलत वापस पाना है तो उन्हें समुद्र मंथन करना होगा जिसमें लुप्त हुई चीज पूर्णा प्राप्त होगी लेकिन देवताओं के पास इतनी शक्ति थी नहीं कि वह समुद्र मंथन स्वयं कर सके तो विष्णु भगवान ने उन्हें वे समुंद्र मंथन में असुरों के शक्तियों का प्रयोग कर सकते हैं लेकिन समुंद्र से प्रकट होने वाली हर चीज का देवताओं तथा असुरों में बटवारा होगा क्योंकि आसुर तो बिना लाभ के देवताओं की मदद नहीं करेगा

जब असुरों ने स्वर्ग लोक पर चढ़ाई की

असुर देवताओं के राज्य पर चढ़ाई करने आए थे लेकिन किसी तरह विष्णु भगवान और देवताओं ने असुर के राजा बली को समझाया कर समुद्र मंथन के लिए शामिल कर लिया

समुंद्र मंथन में प्रयोग होने वाली सामग्री
समुंद्र मंथन के लिए महासागर को चुना गया था उसमें मंथन करने के लिए पर्वत को चुना गया था लेकिन यह पर्वत समुंद्र मंथन के दौरान धीरे-धीरे डूबने लगा इसलिए श्री हरि विष्णु ने अपने कछुए अवतार में आकर पर्वत को अपनी पीठ पर उठा लिया लेकिन यह मंथन कुछ ही समय तक चला क्योंकि मंथन करने के लिए जिस रस्सी का प्रयोग किया जा रहा था वह टूट गया लेकिन महादेव ने अपने गले से वासुकी नाग को समुंद्र मंथन के लिए दे दिया किसके यह समुंद्र मंथन संभव हो पाया।

समुंद्र मंथन से निकली 14 अद्भुत रत्न और उनके विभाजन

हलाहल बिष – समुद्र मंथन के दौरान निकलने वाली सबसे पहली चीज हलाहल कालकूट बिष था यह बिष इतना खतरनाक किसी भी देवता या आसुर को मौत की नींद सुलाने में सक्षम होती है इस बिष की उर्जा इतनी तीव्र थी कि देवता और असुर दोनों ही जलने लगे थे
इसलिए इसे कोई भी नहीं लेना चाहता था तभी देवों के देव महादेव प्रकट हुए और इस बिष को ग्रहण किया और पूरी सृष्टि को बचा लिया

कामधेनु गाय – कामधेनु गाय ऐसी गई थी जो कोई भी यग सामग्री अपनी शक्ति प्रकट कर सकती थी इसे ऋषि मुनि ने लिया।

उच्च श्रावा घोड़ा – तीसरी चीज निकलने वाली उच्च श्रावा घोड़ा था जिसका रंग सफेद था जो कि मन की गति से चलता था इसको असुरों के राजा बाली ने ग्रहण किया।

एरावत हाथी – समुंद्र मंथन से निकलने वाली चौथी चीज एरावत हाथी था जोकि इंद्रदेव का वाहन हुआ करता था इस हाथी का दांत कैलाश पर्वत से भी ज्यादा चमकती थी और यह बहुत ही सुंदर और शक्तिशाली हाथी था उस हाथी में 10000 हाथियों का ताकत था उस हाथी को इंद्रदेव ने ही ग्रहण किया।

मनी – समुद्र मंथन से निकलने वाली पचवा वस्तु क्योंकि बहुत ही अद्भुत कार्य करता था इसे स्वयं विष्णु भगवान ने ग्रहण किया।

कल्पवृक्ष – समुद्र मंथन से निकलने वाली छठी चिज कल्पवृक्ष थी यह वृक्ष पूरी इच्छाओं को पूरी करती थी कल्पवृक्ष को सभी देवताओं ने मिलकर स्वर्ग में स्थापित कर दिया।

रंभा नामक अप्सरा – समुंद्र मंथन के सातवें क्रम में
रंभा नामक अप्सरा प्रकट हुई जोकि बहुत ही सुंदर थी उसकी सुंदरता के मोह में देवताओं और असुर मोहित हो रहे थे अप्सरा को देवताओं ने ही रखा।

लक्ष्मी जी – समुंद्र मंथन के आठवें स्थान पर लक्ष्मी प्रकट हुई देवी लक्ष्मी को देखकर असुर देवता ऋषि मुनि सभी चाहते थे कि देवी लक्ष्मी उनके पास रहे देवी लक्ष्मी भगवान विष्णु के अर्धांगिनी थी इसलिए उन्होंने श्री हरि विष्णु को अपना पति मान कर उनके साथ रही।

वारूणी देवी – नवें स्थान पर प्रकट होने वाली वारूणी देवी चौकी मदिरा (शराब) की देवी थी वह जितना चाहिए उतना मादिरा बना सकती थी इस देवी को असुरों ने लिया।

चंद्रमा – समुंद्र मंथन के दसवें क्रम में चंद्रमा निकला चंद्र देव के इच्छा अनुसार महादेव ने चंद्रमा को अपने शीश पर धारण किया।

पारिजात वृक्ष – एगवे स्थान पर प्राप्त होने वाली पारिजात बृक्ष थी इस वृक्ष को मात्र छूने से ही थका हुआ व्यक्ति को पल भर में उसके दर्द को मिटाकर आराम पहुंचा सकती थी और इससे ही देवताओं ने प्राप्त किया।

पांचजन्य शंख – बारहवें स्थान पर प्रकट होने वाले वस्तु का नाम पांचजन्य शंख था पांचजन्य शंख जोकि विजय का प्रतीक है और इसे श्री हरि विष्णु ने ग्रहण किया।

भगवान धन मंत्री – तेरहवें भी स्थान पर भगवान धनमंत्री अपने हाथों में अमृत लिए हुए प्रकट हुए ।

भगवान धनमंत्री अमृत – अंतिम क्रम में भगवान धन मंत्री ने अमृत को लेकर प्रकट हुए और इस अमृत को देवराज इंद्र के आदेश पर उसके पुत्र जयरथ अमृत लेकर भाग गया और उसके पीछे-पीछे असुर उसे पकड़ने के लिए भागे।

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