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स्वामी विवेकानंद जी की कहानी | Swami vivekananda ji ki kahani

स्वामी विवेकानंद जी की कहानी

जैसा कि हम लोग जानते हैं स्वामी विवेकानंद जी का दिमाग बहुत ही तेज था वह जो भी कुछ एक बार पढ़ लेते उसे शब्द से लेकर कोमा मत तक याद रखते थे स्वामी विवेकानंद जी जहां भी जाते सबसे पहले उन्हें लाइब्रेरी तलाश रहती थी क्योंकि उन्हें किताबों को पढ़ना बहुत पसंद था उनका उसमें बहुत रूचि था। एक बार की बात है स्वामी विवेकानंद जी देश भ्रमण में थे उनके साथ-साथ उनके गुरु भाई हुए थे स्वामी विवेकानंद को एक लाइब्रेरी बहुत पसंद आया फिर उन्होंने सोचा क्यों ना यहां को समय कहीं रुक कर कुछ दिनों तक इस लाइब्रेरी का किताबें पढ़ा जाए वह यह सोचकर वहीं पर अपना कहीं डेरा ढूंढ कर रहना शुरू कर दिया और लाइब्रेरी से रोज सुबह गुरु भाई मोटी – मोटी किताबें ले जाते स्वामी विवेकानंद जी के लिए। और शाम को किताब लाइब्रेरी वाले को वापस दे देते। लाइब्रेरीवाला सोचा मोटी मोटी किताब सुबह ले जाते और शाम को वापस कर देता है आखिर करता क्या है किताबों को। लाइब्रेरी वाले को यह प्रश्न बहुत परेशान कर रहा था उसे रहा नहीं गया एक दिन उसने पूछ ही लिया गुरु भाई से कि तुम इस किताबों को करते क्या हो। क्योंकी इतनी मोटी – मोटी छह – सात सौ पेज की किताबें किसी का पढ़ना कुछ घंटों प पढना संभव तो है नहीं। गुरु भाई बोले इन किताबों का हमारे स्वामी विवेकानंद जी पढ़ते हैं यह बात सुनकर लाइब्रेरीवाला हंसने लगा उसने कहा तुम मजाक कर रहे हो तुम्हें क्या मैं मूर्ख लगता हूं इतनी मोटी मोटी किताब भला कोई इंसान कैसे कुछ घंटों में पढ़ सकता है तुम झूठ बोल रहे हो मुझे तुम पर विश्वास नहीं गुरु भाई ने बोला मैं सच बोल रहा हूं तुम मेरा यकीन करो लाइब्रेरीवाला ने बोला अगर यही बात है गुरु जी को यहां लेकर आओ मैं भी देखूं कि ऐसा कौन सा इंसान है जो असंभव काम को को संभव कर देता गुरु भाई स्वामी विवेकानंद के पास गए और उन्होंने सारे कहानी बताएं जो स्वामी विवेकानंद जी उनके साथ लाइब्रेरी जाने का निश्चय कर लिया अगले दिन गुरु भाई अपने साथ स्वामी जी को लेकर लाइब्रेरी आए और लाइब्रेरीवाला स्वामी जी को देखते रह गए कि ये इंसान है जो मोटी – मोटी किताबें को कुछ घंटों में पढ़ डालता है उसे यकीन नहीं था उसे लगा कि स्वामी जी झूठे है उसने स्वामी जी का परीक्षा लेने की सूचा परीक्षा लेने के बारे में सोचें। लाइब्रेरीवाला स्वामी जी का पढा हुआ किताबों को अपने हाथ में उठाया और स्वामी जी से किताब में लिखा हुआ प्रश्न कहीं से भी करने लगा जितने भी प्रश्न पूछे उसने स्वामी जी ने उसका सटीक उत्तर दिया उत्तर के साथ-साथ उन्होंने यह भी बता दिया कि ,यह प्रश्न किस किताब से और कौन सा पेज पेज नंबर , और कौन सा लाइन से पूछा गया है। यह तक उन्होंने बता दिया यह सब सुनकर लाइब्रेरी का मुंह खुला का खुला रह गया उसे यकीन नहीं हो रहा था कि जितने भी उसने प्रश्न पुछे सबका जवाब ना केवल उन्होंने सही दिया बल्कि साथ ही कौन सा प्रश्न किस पेज से पूछा गया वह तक उन्होंने बता दिया उन्होंने स्वामी विवेकानंद जी का पैर छू लिया वह लाइब्रेरीवाला स्वामी जी के सामने नतमस्तक हो गया और कहां भारत हमें इतने महान – महान लोग होते हैं